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Thursday, April 1, 2010

अधिकार, उलझन और औचित्य!
-गोपाल झा
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने एक अप्रैल 2010 को बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार के संघर्ष की राह में मील का पत्थर बताया है। यकीनन, सिब्बल की सोच स्वच्छ व सटीक है लेकिन इसके बावजूद शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा देने वाला संविधान का 86 वां संशोधन कई तरह के उलझनों को पैदा करता है। पहली बात तो यह कि क्या शिक्षा को अनिवार्य करने की यह पहल नई है? कभी साक्षरता तो कभी सर्वशिक्षा अभियानों के नाम पर अरबों रुपए को पानी की तरह बहाने का प्रयोग कभी नहीं हुआ? अगर हां तो इसके बावजूद देश भर में लाखों बच्चे ड्रॉपआउट क्यों हैं? सिब्बल इस कानून को बच्चों के नजरिए से देखने की बात करते हैं। उनका मानना है कि यह बच्चों के लिए ऐसी शिक्षा को अनिवार्य बनाता है जो भय, तनाव और उत्तेजना से मुक्त हो। बस्ता का बोझ कम करने को लेकर भी उनके विचारों का मैं कायल हूं यह अलग बात है कि यह सुनिश्चित होने में वक्त लगेगा।
उलझन इस बात को लेकर भी है कि देश में अधिकांश कानूनों की मंशा पाक और साफ होती हैं लेकिन जब क्रियान्विति के मौके आते हैं तो वह नौकरशाही व लालफीताशाही उन पर किस तरह कुंडली मारकर बैठ जाती है। लिहाजा सवाल उठता है कि सरकार इस कानून की पालना सुनिश्चित करने में कोताही बरतने वालों पर अंकुश लगाने के लिए क्या सोचती है?
बात सिर्फ राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की करें तो जहां एक तरफ करीब दस हजार बच्चों ने स्कूलों की ओर कभी रुख नहीं किया वहीं ताजा सूचना के मुताबिक शिक्षा विभाग ने जिले के 43 विद्यालयों को महज इसलिए बंद करने की सिफारिश की है क्योंकि उन विद्यालयों में बच्चे ही नहीं हैं। चौंकाने वाली बात तो यह है कि 20 ऐसे विद्यालय हैं जिनमें कभी एक भी बच्चा पढऩे नहीं गया और अध्यापक बेखौफ होकर वर्षों से मुफ्तखोरी करते रहे। बेशक, सरकार ऐसे शिक्षकों को किसी दूसरे विद्यालयों में समायोजित कर देगी लेकिन क्या यह नाकाफी है? ऐसे शिक्षक दंड के भागीदार नहीं हैं? क्या ऐसे 'राष्ट्रनिर्माताओं' पर सरकारी खजाने में डाका डालने का मुकदमा नहीं बनना चाहिए?
इन उलझनों के बीच इस तरह के कानून के औचित्य पर सवाल उठना लाजिमी है। इन चर्चाओं के बीच बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा की टिप्पणी काबिलेगौर है कि जिस दिन अध्यापक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन ईमानदारीपूर्वक करना शुरू कर देंगे, उसी दिन से देश की दशा और दिशा में बदलाव नजर आने लगेगा। बहरहाल, सिब्बल साहब के 'अनूठे प्रयोग' का स्वागत होना चाहिए तथा उम्मीद करनी चाहिए कि उन्होंने जिस सोच व मंशा से यह कानून बनाया है, वह उससे बेहतर तरीके से फलीभूत भी हो, तभी इस तरह के कानूनों का औचित्य है, वरना इस तरह के मुद्दे कुछ समय तक सुर्खियों में रहने के बाद किस तरह आंखों से ओझल हो जाते हैं, पता भी नहीं चलता।

1 comment:

  1. योजना देखते
    नहीं आता समझ
    कौन किसे पीस रहा है?
    योजना को सरकार
    या सरकार को योजना!
    रंग-बिरंगे प्रलोभन
    छनछनाती बातेें हीं फसाती हैं।
    नहीं दिख पाते
    भीतर के गंभीर परिणाम

    कप्पिल सिब्बल की सोच की बात करें तो वो बहुत ही अच्छी लगती है, उनकी योजना की सफलता-विफलता का असलियत में निर्धारण उसे लागू करने वालो पर निर्भर करता है। कि वे लोग उस योजना को किस हद तक सफलता से लागू कर पाते हैं। जब सिब्बल को इस संबंध में कोई शिकायत मिले, तो ही वे उन समस्याओं का निस्तारण करवा सकते हैं।
    क्रियान्विति के मौके आते हैं तो वह नौकरशाही व लालफीताशाही उन पर किस तरह कुंडली मारकर बैठ जाती है। यही बात ही तो सभी योजना को लाभप्रद की बातों को समाप्त कर देती हैं। योजना वहीं विफल होती हैं, जहां उन्हें लागू करवाने में कोताही बरतते हैं। कोताही वे लोग ही बरतते हैं, जो योजना समन्वयकों (किसी बड़े अधिकारी के) के संबंधी होते, जिनकी पहुंच ऊपर तक होती है।

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