Gopal Jha's Poll

Sunday, April 4, 2010

सानिया, शोएब और....!
जहब व क्षेत्रीयता के नाम पर सियासत करने में माहिर बाल ठाकरे दिल के बेहतरीन डॉक्टर भी हैं, यह पहली बार पता चला। उन्होंने सानिया मिर्जा तथा शोएब मलिक प्रकरण में 'सनसनीखेज' खुलासा किया कि सानिया का दिल पाक क्रिकेटर के लिए धड़कता है, इसलिए अब वे हिंदुस्तान की तरफ से खेलने की हकदार नहीं हैं। कहते हैं फितरत को बदलना मुश्किल होता है, शायद ठाकरे साहब के साथ भी यही समस्या है। हर मसले को जाति, धर्म व क्षेत्र से जोडऩा और उस पर जहरीले शब्दों का तीर चलाना कोई उनसे सीखे। (बाकी को जरूरत नहीं लेकिन उनका भतीजा जरूर पारंगत हो गया)
बाला साहब की इस टिप्पणी से किसी को आश्चर्य हुआ हो, ऐसा नहीं है। इससे 'बेहतर' टिप्पणी की उम्मीद व्यर्थ है लेकिन एक सवाल जेहन में कौंधता है कि इस तरह के खास अवसरों पर वे चुप रहने से बाज क्यों नहीं आते? आखिर वे हैं क्या? (इसका जवाब भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मिल चुका है।)
सानिया-शोएब निकाह कर रहे हैं तो मुझे नहीं लगता कि किसी को परेशानी होनी चाहिए। यह उनकी पर्सनल लाइफ है। किसी का दिल कब और किस पर आ जाए, पता थोड़े न है! फिर वे दोनों खेल जगत की अंतरराष्ट्रीय हस्ती हैं। क्या शादी जैसे निजी संबंधों के लिए भी किसी को सार्वजनिक स्वीकृति लेने की जरूरत है?
समूचे घटनाक्रम में इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया भी कुछ कम नहीं है। ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर जिस तरह एक ही खबर को बार-बार दोहराने की प्रक्रिया चल रही है, लगता नहीं, इससे उनकी टीआरपी बढऩे वाली है। मतलब साफ है। ठाकरे और मीडिया को भ्रम है कि देश और दुनिया को उनकी बातों में दिलचस्पी है। इसलिए वे बात को बतंगड़ बताने से नहीं चूकते। अगर ऐसा है तो यह अभिमान ठीक नहीं है। लिहाजा, ठाकरे और मीडिया के लिए ही मानो किसी ने कहा भी है....
गुरूर उसपे बहुत सजता है, मगर कह दो
इसी में उसका भला है कि गुरूर कम कर दे।

Saturday, April 3, 2010

मिट्टी का जिस्म लेकर पानी के घर में हूं....
ब भी कोई अखबार लांच होता है तो मंचासीन अतिथि अपने श्रीमुख से 'खींचो न कमान/न तलवार निकालो/ जब तोप मुकाबिल हो/ तो अखबार निकालो' जुमला सुनाकर बेवजह तालियां बटोर लेते हैं। सच बताऊं...मुझे इन पंक्तियों को सुनकर पीड़ा होती है। 16 साल से सुन-सुनकर बोर ही तो हो रहा हूं। विशेषकर छोटे अखबारों की बात करें तो इन पंक्तियों का कोई मतलब नहीं रह गया है। देश में हजारों नहीं लाखों लोग 'पंपलेटनुमा' अखबार निकालकर गुजर-बसर कर रहे हैं। मुझे ताज्जुब होता है कि पाठकों की अच्छी लगने वाली खबरें छापकर भी मैं पाक्षिक अखबार को रेगुलर नहीं चला पाया और आखिर में बंद कर नौकरी ज्वाइन कर ली। वहीं आजकल बेहतर खबरों की छोडि़ए सिर्फ विज्ञापन के दम पर लोग दैनिक अखबारों का प्रकाशन कर रहे हैं। इतना ही नहीं, इनके संपादक भी ऐसे जिन्हें पत्रकारिता के 'क..ख..ग' से कोई लेना-देना नहीं। यकीकन, नियमों का पालन करते हुए अखबार चलाना मुश्किल नहीं असंभव है। इस बात से आप इत्तिफाक रखेंगे, ऐसी उम्मीद है।
सेमिनारों व गोष्ठियों में इस तरह की बातों पर सवाल उठता है कि क्या बड़े मीडिया ग्रुप इन बातों का खयाल रखते हैं? अगर नहीं तो छोटे अखबारों पर छींटाकशी करने का क्या औचित्य है? सवाल सटीक है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बड़े ग्रुप कम से कम पाठकों की रुचि तथा सामाजिक सरोकारों से तो संबद्ध हैं और बाकी....? जाहिर है अगर इन छोटे अखबारों का पाठकों की रुचि तथा सामाजिक सरोकारों से कोई वास्ता नहीं तो फिर इसके संचालन का क्या औचित्य है?
देश भर में हजारों ऐसे अखबार हैं जो सिर्फ फाइलों में छपते हैं। निर्धारित समय तक प्रकाशित होने का प्रमाण मिलने के बाद शासन भी उसे विज्ञापनों के लिए मंजूरी दे देता है और फिर....? दसवीं फेल संपादकजी की हेकड़ी का कहना ही क्या। उनके अतिउत्साहित होने का खामियाजा बेचारे पुलिसवालों, छोटे-छोटे दुकानदारों व कर्मचारियों को झेलना पड़ता है। ऐसे में किसी ने क्या खूब लिखा है.....
ये खबर लिखना उनका काम नहीं
जिनके दिल आंखों में बसा करते हैं,
खबर तो वो शख्स लिखते हैं
जो शराब से नहीं कलम से नशा करते हैं।
यकीनन, अखबार समाज को आइना दिखाता है। खबरों को पढ़कर लोग आश्वस्त होते हैं। पत्रकार लोकतंत्र का प्रहरी है। समाज में उसे सम्मान प्राप्त है, दूसरों से श्रेष्ठ बनने के लिए कुछ अलग दिखना ही होगा, यही सभ्य समाज का दस्तूर भी है। पत्रकारिता इतना आसान नहीं है। चुनौतीपूर्ण दायित्व है यह। खबरनवीसों को लेकर किसी ने ठीक ही तो कहा है....
मिट्टी का जिस्म लेकर पानी के घर में हूं
मंजिल है मौत मेरी हर पल सफर में हूं,
होना है कत्ल ये मालूम है मुझको
फिर भी क्यों सबकीनजर में हूं।

Thursday, April 1, 2010

अधिकार, उलझन और औचित्य!
-गोपाल झा
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने एक अप्रैल 2010 को बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार के संघर्ष की राह में मील का पत्थर बताया है। यकीनन, सिब्बल की सोच स्वच्छ व सटीक है लेकिन इसके बावजूद शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा देने वाला संविधान का 86 वां संशोधन कई तरह के उलझनों को पैदा करता है। पहली बात तो यह कि क्या शिक्षा को अनिवार्य करने की यह पहल नई है? कभी साक्षरता तो कभी सर्वशिक्षा अभियानों के नाम पर अरबों रुपए को पानी की तरह बहाने का प्रयोग कभी नहीं हुआ? अगर हां तो इसके बावजूद देश भर में लाखों बच्चे ड्रॉपआउट क्यों हैं? सिब्बल इस कानून को बच्चों के नजरिए से देखने की बात करते हैं। उनका मानना है कि यह बच्चों के लिए ऐसी शिक्षा को अनिवार्य बनाता है जो भय, तनाव और उत्तेजना से मुक्त हो। बस्ता का बोझ कम करने को लेकर भी उनके विचारों का मैं कायल हूं यह अलग बात है कि यह सुनिश्चित होने में वक्त लगेगा।
उलझन इस बात को लेकर भी है कि देश में अधिकांश कानूनों की मंशा पाक और साफ होती हैं लेकिन जब क्रियान्विति के मौके आते हैं तो वह नौकरशाही व लालफीताशाही उन पर किस तरह कुंडली मारकर बैठ जाती है। लिहाजा सवाल उठता है कि सरकार इस कानून की पालना सुनिश्चित करने में कोताही बरतने वालों पर अंकुश लगाने के लिए क्या सोचती है?
बात सिर्फ राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की करें तो जहां एक तरफ करीब दस हजार बच्चों ने स्कूलों की ओर कभी रुख नहीं किया वहीं ताजा सूचना के मुताबिक शिक्षा विभाग ने जिले के 43 विद्यालयों को महज इसलिए बंद करने की सिफारिश की है क्योंकि उन विद्यालयों में बच्चे ही नहीं हैं। चौंकाने वाली बात तो यह है कि 20 ऐसे विद्यालय हैं जिनमें कभी एक भी बच्चा पढऩे नहीं गया और अध्यापक बेखौफ होकर वर्षों से मुफ्तखोरी करते रहे। बेशक, सरकार ऐसे शिक्षकों को किसी दूसरे विद्यालयों में समायोजित कर देगी लेकिन क्या यह नाकाफी है? ऐसे शिक्षक दंड के भागीदार नहीं हैं? क्या ऐसे 'राष्ट्रनिर्माताओं' पर सरकारी खजाने में डाका डालने का मुकदमा नहीं बनना चाहिए?
इन उलझनों के बीच इस तरह के कानून के औचित्य पर सवाल उठना लाजिमी है। इन चर्चाओं के बीच बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा की टिप्पणी काबिलेगौर है कि जिस दिन अध्यापक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन ईमानदारीपूर्वक करना शुरू कर देंगे, उसी दिन से देश की दशा और दिशा में बदलाव नजर आने लगेगा। बहरहाल, सिब्बल साहब के 'अनूठे प्रयोग' का स्वागत होना चाहिए तथा उम्मीद करनी चाहिए कि उन्होंने जिस सोच व मंशा से यह कानून बनाया है, वह उससे बेहतर तरीके से फलीभूत भी हो, तभी इस तरह के कानूनों का औचित्य है, वरना इस तरह के मुद्दे कुछ समय तक सुर्खियों में रहने के बाद किस तरह आंखों से ओझल हो जाते हैं, पता भी नहीं चलता।