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Sunday, May 9, 2010

मां....आज तू याद आती है...!


मां....आज तू याद आती है...!
मां! पहले आंसू आते थे
और तू याद आती थी,
आज तू याद आती है,
और आंसू आते हैं...।
इन चंद अल्फाज को कुछ अरसे के दौरान मैंने महसूस किया है। 26 अक्टूबर 09 की रात्रि जब मां ने मेरे सामने अंतिम सांस ली तो मैं हतप्रभ था। शायद मैं दुनिया का पहला अभागा होऊंगा जिसने मां की मौत पर तत्काल बेचैनी महसूस नहीं की। मानो मुझे उनकी मौत का इंतजार था। दरअसल मां कैंसर से पीडि़त थीं। जब आखिरी बार एक निजी हॉस्पीटल में दाखिल करवाया तो बिगड़ती स्थिति देखकर डॉक्टर ने जीवन में आने वाले भूचाल से मुझे अवगत करवा दिया था। वास्तविकता यह थी कि हम परिजनों के साथ उनकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। बाबूजी मां को घर ले जाने की जिद कर रहे थे और मैं अस्पताल में रखने की। डॉक्टर के कहने के बावजूद मन के कोने में उम्मीद की एक लौ जो टिमटिमा रही थी। मंदिरों से दूर-दूर रहने की प्रवृत्ति के बावजूद मैं इच्छापूर्ण बालाजी के मंदिर में मत्था टेकने जाने लगा था। मां की बेबसी, लाचारी और असहनीय पीड़ा हमसे देखी नहीं जा रही थी। मैं शायद दुनिया का इकलौता बदनसीब हूं जिसने भगवान से प्रार्थना के वक्त उन्हें विकल्प देने की हिमाकत की थी कि या तो चमत्कार कर मां को स्वस्थ कर दीजिए या फिर उन्हें अपने पास बुला लीजिए।
सचमुच, उस वक्त हमने खुद को सर्वाधिक बेबस, कमजोर और लाचार पाया था। मां के जाने के बाद समाज का रुख मेरे लिए अविस्मरणीय था। प्रत्येक वर्ग ने मेरे प्रति जो संवेदना दिखाई, इस जीवन में उसे भुला पाना असंभव है।
खैर...क्रिया-कर्म के बाद रिश्तेदार भी लौट गए। वक्त बीतता गया और मेरी तड़प बढ़ती गई। मेरी आंखें मां से मिलने के लिए छटपटाने लगी हैं। मन की मामूली सी उलझन मुझे मां की याद दिलाती है। तन्हाई में उन्हें खुद के पास पाता हूं। जैसे किसी ने कहा भी है। 'जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है/ मां दुआ करती हुई ख्वाबों में आ जाती है।' लेकिन यह तो क्षणिक संतुष्टि है, जब आंखों से पानी बहता है तो कुछ देर के लिए हम खुद को सहज पाते हैं लेकिन इससे पीड़ा कम नहीं होती। फिर मां से सदा के लिए बिछडऩे की पीड़ा.....? बड़ा असहनीय है।
आचार्य विजययशावर्म सूरि कहते हैं 'संसार की दो बड़ी करुणताएं हैं, एक तो मां का घर और दूसरा घर बिना मां।' अब यह तय नहीं कर पा रहा कि हम किस कोटि में आते हैं। मन के भीतर ज्ञान और मोह के बीच कशमकश है। मुझे यह स्वीकार करने से गुरेज नहीं कि इसमें मोह का पलड़ा भारी है।
खैर...., मदर्स डे पर इस तरह जीवन की किताब को खोलना अच्छा नहीं लग रहा, लेकिन इरादा सिर्फ इतना है कि सौभाग्यवश जिनकी भी मां मौजूद हैं, वे उनके असीम और निश्छल स्नेह को महसूस करें। दरअसल जो हमारे पास है, उसकी कीमत को आंकने की कोशिश नहीं करते और जो नहीं है, उसे पाने के लिए छटपटाते भर हैं। मां के साथ अधिकाधिक वक्त गुजारें, उनकी हर इच्छा को पूरी करने की कोशिश करें। यह समझें कि मां के रूप में भगवान आपके सामने हैं। आप बाहर जाकर बड़े बन जाते हैं तो सिर्फ ओहदे के कारण लेकिन जब घर जाते हैं और मां से मिलते हैं तो बच्चा ही रहते हैं। कितना आनंद आता है, मां के समक्ष इतराने में। शायद इसीलिए...'मेरी ख्वाहिश है कि मैं फरिश्ता हो जाऊं, मां से इस तरह लिपट जाऊं कि फिर से बच्चा हो जाऊं...।' लेकिन यह मेरे लिए संभव नहीं क्योंकि मेरे पास मां नहीं है लेकिन आपके पास तो...मां है ना!